(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.59. अध्यायः 059
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
कृष्णेनाहृतविभूतिविलोकनाय देवकीरुक्मिण्यादिस्त्रीणामागमनम्॥1॥ सभामागतायाः यशोदासुतायाः रामकृष्णाभ्यां सत्कारः॥ 2॥ सर्वेषां स्वस्वभवनगमनम्॥ 3॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच॥

ततः सर्वदशार्हाणामाहुकस्य च याः स्त्रियः।
नन्दगोपस्य महिषी यशोदा लोकविश्रुता॥ 2-59-1(13685)
रेवती च महाभागा रुक्मिणी च पत्रिव्रता।
सत्या जाम्बवती चोभे गान्धारी शिंशुमापि च॥ 2-59-2(13686)
विशोका लक्षणा चापि सुमित्रा केतुमा तथा।
वासुदेवमहिष्योऽन्याः श्रिया सार्धं ययुस्तदा॥ 2-59-3(13687)
विभूतिं द्रष्टुमनसः केशवस्य महात्मनः।
प्रीयमाणाः सभां जग्मुरालोकयितुमच्युतम्॥ 2-59-4(13688)
देवकी सर्वदेवीनां रोहिणी च पुरस्कृता।
ददृशुर्देवमासीनं कृष्णं हलभृता सह॥ 2-59-5(13689)
तौ तु पूर्वमतिक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च।
अभ्यवादयतां देवौ देवकीं रामकेशवौ॥ 2-59-6(13690)
सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभेऽधिकम्।
देवकी देवमातेव मित्रेण वरुणेन च॥ 2-59-7(13691)
ततः प्राप्ता यशोदाया दुहिता वै क्षणेन हि।
जाज्वल्यमाना वपुषा प्रभयाऽतीव भारत॥ 2-59-8(13692)
एकानङ्गेति यामाहुः कन्यां वै कामरूपिणीम्।
यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः॥ 2-59-9(13693)
ततः स भगवान्रामस्तामुपाक्रम्य भामिनाम्।
मूर्ध्न्युपाघ्राय सव्येन परिजग्राह पाणिना॥ 2-59-10(13694)
तां च तत्रोपसम्प्राप्य प्रियामिव सखीमिमाम्।
दक्षिणेन कराग्रेण पिरजग्राह माधवः॥ 2-59-11(13695)
ददृशुस्तां सभामध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः।
रुक्मपद्मशां पद्मश्रीमिवोत्तमनाभयोः॥ 2-59-12(13696)
अथाक्षतमहावष्ट्या लाजपुष्पघृतैरपि।
वृष्णयोऽवाकिरन्प्रीताः सङ्कर्षणजनार्दनौ॥ 2-59-13(13697)
सबालाः सहवृद्धाश्च ये ज्ञातिकुलबान्धवाः।
उपोपविविशुः प्रीता वृष्णयो मधुसूदनम्॥ 2-59-14(13698)
पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः।
विवेश पुरुषव्याघ्रः स्ववेश्म मधुसूदनः॥ 2-59-15(13699)
रुक्मिण्या सहितो देव्या प्रमुमोद सुखी सुखम्।
अनन्तरं च सत्याया जाम्बवत्याश्च भारत॥ 2-59-16(13700)
सर्वासां च यदुश्रेष्ठो गेहे गेहे विहारवान्।
जगाम च हृषीकेशो रुक्मिण्याः सदनं पुनः॥ 2-59-17(13701)
एष तात महाबाहो विजयः शार्ङ्गधन्वनः।
एतदर्थं च जन्माहुर्मानुषेषु महात्मनः॥ ॥ 2-59-18(13702)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अर्घाहरणपर्वणि एकोनषष्टितमोऽध्यायः॥ 59 ॥


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